Raksha Bandhan History || रक्षाबंधन का इतिहास व पौराणिक कथाएं

Raksha Bandhan History || रक्षाबंधन का इतिहास व पौराणिक कथाएं

Raksha Bandhan History

Raksha Bandhan History || रक्षाबंधन का इतिहास व पौराणिक कथाएं

 

न मांगे वो धन और दोलत, न मांगे उपहार

चाहत बहन की इतनी कि बस बना रहे ये प्यार,

गम ना कोई पास में आये खुशियाँ मिले हजार

ऐसा ही संदेश है लाता राखी का ये त्योहार

ऐसा ही संदेश है लाता राखी का ये त्योहार।

 

रक्षा बंधन भाई-बहन के प्यार का त्योहार है, एक मामूली सा धागा जब भाई की कलाई पर बंधता है, तो भाई भी अपनी बहन की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर करने को तैयार हो जाता है।

 

Raksha Bandhan Tyohar || रक्षाबंधन का त्योहार

 

          क्या आप जानते हैं कि रक्षाबंधन ( Raksha Bandhan ) का इतिहास काफी पुराना है, जो सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है। असल में रक्षाबंधन ( Raksha Bandhan ) की परंपरा उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं, भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो, लेकिन उसकी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है।

          इतिहास के पन्नों को देखा जाए तो इस त्योहार की शुरुआत 6 हजार साल पहले से ही माना जाता है। इसके कई साक्ष्य भी इतिहास में दर्ज हैं। रक्षाबंधन ( Raksha Bandhan ) की शुरुआत का साक्ष्य रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं का है।

 

रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं – Rani Karnavati and Humayun

          मध्यकालीन युग में जब राजपूत और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब चित्तौड़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न  मिलता देख हुमायूं को राखी भेजी थी। तब हुमायूं ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था।

 

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सिकंदर व पोरस – Sikander and Porus

           इस पौराणिक कथा में  सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरू को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया । पुरू ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

          सिकंदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रुक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

 

निजाम रानी और मोहम्मद – Nizam Rani and Mohammed

          गिन्नौरग़ढ़ के निजाम शाह गोंड के रिश्तेदार आलम शाह ने उन्हें एक षड्यंत्र के तहत जहर देकर मार डाला था। निजाम रानी कमलापति गोंड ने अपने पति की मौत का बदला लेने और अपनी रियासत को बचाने के लिए सरदार दोस्त मोहम्मद खान को राखी भेजकर मदद की गुजारिश की।

          दोस्त मोहम्मद खान ने रानी के रियासत की रक्षा की। रानी ने अपने भाई दोस्त मोहम्मद के प्रति कृतज्ञता जाहिर करते हुए 50 हजार की राशि और 2 हजार की जनसंख्या वाला एक छोटा-सा गांव भेंट किया। दोस्त मोहम्मद खां ने 1722 में भोपाल रियासत की नींव डाली और इस इलाके की बर्रूक झाडि़यों को काट-काट भोपाल रियासत को बसाना शुरू किया।

          इस तरह भोपाली “बर्रूककाट भोपाली” कहलाए। सन्‌ 1723 ईस्वी में रानी कमलापति की मृत्यु के बाद दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौर ग़ढ़ को भी अपनी सल्तनत में शामिल कर लिया।

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कृष्ण और द्रोपदी – Krishna and Draupadi

          एक उदाहरण कृष्ण और द्रोपदी का माना जाता है। कृष्ण भगवान ने राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएं हाथ की उंगली से खून बह रहा था, इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की उंगली में बांध दी, जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। कहा जाता है तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। सालों के बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था, तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी।

 

श्री गणेश और संतोषी मां – Shri Ganesh and Maa Santoshi

          भगवान गणेश के बेटे शुभ और लाभ एक बहन चाहते थे। तब भगवान गणेश ने यज्ञ वेदी से संतोषी मां का आह्वान किया। रक्षा बंधन, शुभ, लाभ और संतोषी मां के दिव्य रिश्ते की याद में भी मनाया जाता है। यह रक्षा विधान श्रावण मास की पूर्णिमा को प्रातः काल संपन्न किया गया था तब ही से रक्षा बंधन अस्तित्व में आया और श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने लगा।

 

इंद्राणी एवं इंद्र – Indrani and Indra

          भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवता और दैत्यों (दानवों) में 12 वर्षों तक युद्ध हुआ परन्तु देवता विजयी नहीं हुए। इंद्र हार के भय से दु:खी होकर देवगुरु बृहस्पति के पास विमर्श हेतु गए। गुरु बृहस्पति के सुझाव पर इंद्र की पत्नी महारानी शची ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से व्रत करके रक्षासूत्र तैयार किए और स्वस्तिवाचन के साथ ब्राह्मण की उपस्थिति में इंद्राणी ने वह सूत्र इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधा। जिसके फलस्वरुप इन्द्र सहित समस्त देवताओं की दानवों पर विजय हुई।

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रक्षा विधान के समय निम्न लिखित मंत्रोच्चार किया गया था जिसका आज भी विधिवत पालन किया जाता है:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।

तेन त्वां अभिबद्धनामि रक्षे मा चल मा चल।।

 

इस मंत्र का भावार्थ है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूँ। हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो।

 

यम और यमुना – Yam and Yamuna

          भाई और बहन के प्रतीक रक्षा बंधन से जुड़ी एक अन्य रोचक कहानी है, मृत्यु के देवता भगवान यम और यमुना नदी की। पौराणिक कथाओं के मुताबिक यमुना ने एक बार भगवान यम की कलाई पर धागा बांधा था। वह बहन के तौर पर भाई के प्रति अपने प्रेम का इजहार करना चाहती थी। भगवान यम इस बात से इतने प्रभावित हुए कि यमुना की सुरक्षा का वचन देने के साथ ही उन्होंने अमरता का वरदान भी दे दिया। साथ ही उन्होंने यह भी वचन दिया कि जो भाई अपनी बहन की मदद करेगा, उसे वह लंबी आयु का वरदान देंगे।

 

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