मेरे बचपन के दिन सारांश | Mere Bachpan Ke Din Summary | NCERT Solutions for class 9       

          आज हम आप लोगों को क्षितिज भाग 1  कक्षा-9 पाठ-7 (NCERT Solutions for class 9 kshitij bhag-1) मेरे बचपन के दिन (Mere Bachpan Ke Din) गद्य-खण्ड के सारांश के बारे में बताने जा रहे है जो कि  महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) द्वारा लिखित है। इसके अतिरिक्त यदि आपको और भी NCERT हिन्दी से सम्बन्धित पोस्ट चाहिए तो आप हमारे website के Top Menu में जाकर प्राप्त कर सकते है।

मेरे बचपन के दिन सारांश | Mere Bachpan Ke Din Summary

          प्रस्तुत पाठ ‘मेरे बचपन के दिन’ में उस समय की स्मृतियों का सजीव चित्रण है जब वे अपनी सहेली सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ विद्यालय में पढ़ा करती थीं। इसमें उन्होंने लड़कियों के प्रति सामाजिक रवैये, विद्यालय में उनकी सहपाठिनों, छात्रावास का जीवन, तत्कालीन सौहार्द्रपूर्ण वातावरण, आपसी प्रेमभाव, स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति विद्यार्थियों का दृष्टिकोण, गाँधी जी के साथ अपनी मुलाकात तथा कवि सम्मेलनों में अपनी उपलब्धियों का सजीव चित्रण किया है। 

          लेखिका के परिवार में पहले 200 वर्षों तक किसी भी लड़की का जन्म नहीं हुआ था, जब भी किसी लड़की का जन्म होता तो उसे मार दिया जाता था। 200 वर्षों के बाद लेखिका का जन्म हुआ। लेखिका के दादा जी ने दुर्गा-पूजा करके लड़की माँगी थी। इसलिए उन्हें अपने बचपन में कोई दुख नहीं हुआ। लेखिका को उर्दू, फारसी, अंग्रेजी तथा संस्कृत भाषाओं को पढ़ने की सुविधा प्राप्त थी। हिंदी पढ़ने के लिए तो उन्हें उनकी माँ ने ही प्रेरित किया था। लेखिका को हिंदी, संस्कृत पढ़ने में तो बहुत ही आनंद आया किंतु उर्दू-फ़ारसी पढ़ने में उनकी रुचि नहीं जागी। मिशन स्कूल की दिनचर्या भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित न कर सकी। इसीलिए उन्हें क्रॉस्थवेट गर्ल्स कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उस कॉलेज में उनको ईसाई व हिन्दू  लड़कियों के साथ रहने का अवसर मिला। 

यह भी पढ़ें   NCERT / CBSE Solution for Class 9 (Hindi)  
मेरे बचपन के दिन के प्रश्न-उत्तर
कृतिका भाग-1
क्षितिज भाग 1

          लेखिका जिस छात्रावास में रहती थीं, वहाँ हर कमरे में चार-चार छात्राएँ रहती थीं। लेखिका के कमरे में सुभद्रा कुमारी चौहान भी थीं, जो वहाँ की सीनियर छात्रा थीं। वे कविता लिखती थीं। इधर लेखिका की माँ भी भजन लिखती और गाती थीं। अतः उन्हें भी लिखने की इच्छा हुई। उन्होंने कविता लिखनी प्रारंभ की और लिखती ही चली गई। 

          एक दिन महादेवी के द्वारा छिप-छिप कर कविता लिखने की भनक सुभद्रा कुमारी के कानों में पड़ी तो उन्होंने लेखिका की कॉपियों में से कविताएँ ढूँढकर उनके विषय में सारे छात्रावास को बता दिया। उस दिन से उन दोनों के बीच मित्रता हो गई। फिर दोनों ही खेल के समय साथ ही बैठकर कविता लिखने लगीं। उनकी तुकबंदी कर लिखी गई कविता ‘स्त्री दर्पण’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। 

          सन् 1917 के आस-पास हिंदी के प्रचार का समय था। अत: उन दिनों कवि सम्मेलन खूब होने लगे थे। लेखिका भी कवि सम्मेलनों में जाने लगीं। उनके साथ क्रॉस्थवेट की एक शिक्षिका उनके साथ जाया करती थीं। उन कवि सम्मेलनों के अध्यक्ष प्रायः हरिऔध, श्रीधर पाठक जैसे महान कवि होते थे। अत: लेखिका अपनी बारी का घबराहट के साथ इंतज़ार करती थीं और अपने नाम की उद्घोषणा सुनने के लिए बेचैन रहती थीं। किंतु उन्हें हमेशा ही प्रथम पुरस्कार ही मिलता था। 

          उन दिनों गाँधी जी आनंद भवन में आया करते थे। लेखिका चाहती थी कि वो गाँधी जी को अपने जेब खर्च से कुछ रुपये बचाकर भेंट के रूप में उनको दे। लेखिका को कवि सम्मेलन में पुरस्कार स्वरूप  एक चाँदी का कटोरा मिला जिसे उन्होंने गाँधी  जी को दिखाया तथा उस चाँदी के कटोरे को गाँधी  जी के माँगने पर देश-हित के लिए उन्हें दे दिया। लेखिका गाँधी  जी को वह कीमती तथा स्मृति-चिह्न रूपी चाँदी का कटोरा भेंट करके बहुत खुश हुई। 

          छात्रावास का जीवन जाति-पाँति के भेद-भाव से दूर आपसी प्रेम से भरा हुआ एक परिवार जैसा था। अतः जेबुन नाम की एक मराठी लड़की, लेखिका का सारा काम कर देती थी। वह हिंदी तथा मराठी भाषा का मिलाजुला रूप बोला करती थी। वह अच्छी हिंदी नहीं जानती थी। वहाँ एक बेगम थीं जिनको मराठी बोलने पर चिढ़ होती थी। इसलिए जेबुन कभी कह देती थी कि ‘हम मराठी हैं तो मराठी ही बोलेंगे।’ उन दिनों देश में सर्वत्र पारस्परिक प्रेम एवं सद्भाव का वातावरण था। अत: अवध की छात्राएँ अवधी, बुंदेलखंड की छात्राएँ बुंदेली बोला करती थीं। इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होती थी। मेस में सभी एक साथ खाना खाती थीं तथा एक ही ईश प्रार्थना एवं भोजन मंत्र बोलती थीं। इसमें कोई झगड़ा नहीं होता था। 

          लेखिका का परिवार जहाँ रहता था वहाँ एक जवारा की बेगम साहिबा का परिवार भी रहता था। उनके परिवारों में बहुत घनिष्ठता थी। उनके बीच जाति एवं धर्म-संबंधी कोई भी भेदभाव नहीं था। वे एक-दूसरे के जन्मदिन पर परिवार जैसे मिलते-जुलते रहते थे। बेगम के बच्चे लेखिका की माँ को चचीजान कहकर बुलाती थी तथा लेखिका बेगम साहिबा को ताई कहकर बुलाती थीं। लेखिका राखी के दिन बेगम साहिबा के बच्चों को राखी बाँधती थीं और मोहर्रम के दिन बेगम साहिबा लेखिका के लिए नए कपड़े अवश्य बनवाती थीं। 

          लेखिका के घर जब छोटे भाई का जन्म हुआ तो बेगम साहिबा ने लेखिका की माँ से माँगकर नेग लिया था। उसका नाम ‘मनमोहन’ भी उसी बेगम साहिबा ने रखा था। वही मनमोहन वर्मा पढ़-लिखकर प्रोफ़ेसर बन गए तथा बाद में जम्मू विश्वविद्यालय तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति बन गए। 

          इस पोस्ट के माध्यम से हम क्षितिज भाग 1  कक्षा-9 पाठ-7 (NCERT Solutions for class 9 kshitij bhag-1) मेरे बचपन के दिन (Mere Bachpan Ke Din) गद्य-खण्ड के सारांश के बारे में जाने, जो कि महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) जी द्वारा लिखित हैं । उम्मीद करती हूँ कि आपको हमारा यह पोस्ट पसंद आया होगा। पोस्ट अच्छा लगा तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूले। किसी भी तरह का प्रश्न हो तो आप हमसे कमेन्ट बॉक्स में पूछ सकतें हैं। साथ ही हमारे Blogs को Follow करे जिससे आपको हमारे हर नए पोस्ट कि Notification मिलते रहे।

          आपको यह सभी पोस्ट Video के रूप में भी हमारे YouTube चैनल  Education 4 India पर भी मिल जाएगी।

  सारांश  प्रश्न-उत्तर 
अध्याय- 1 दो बैलों की कथा प्रश्न -उत्तर
अध्याय- 2 ल्हासा की ओर प्रश्न -उत्तर
अध्याय- 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति  प्रश्न -उत्तर
अध्याय- 4 साँवले सपनों की याद  प्रश्न -उत्तर
अध्याय- 5 नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया प्रश्न -उत्तर
अध्याय- 6 प्रेमचंद के फटे जूते
अध्याय- 7 मेरे बचपन के दिन