Kamayani Jai Shankar Prasad । कामायनी जयशंकर प्रसाद

Kamayani Jai Shankar Prasad । कामायनी जयशंकर प्रसाद

Kamayani Jai Shankar Prasad

Kamayani Jai Shankar Prasad कामायनी जयशंकर प्रसाद

छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक जयशंकर प्रसाद जी का साहित्यिक जीवन लगभग 1910 से आरंभ होता है। इसके बाद साहित्य की अनेक विधाओं में वह निरन्तर लिखते रहे। प्रसादजी की चर्चित कृतियाँ हैं – आँसू‘ , ‘लहरऔर कामायनी‘ (तीनों काव्य); ‘स्कन्दगुप्त‘ , ‘चंद्रगुप्त‘ , ‘अजातशत्रु‘, ‘ध्रुवस्वामिनी‘ (सभी नाटक); ‘तितलीऔर कंकाल‘ (उपन्यास)। इनके अलावा अनेक कहानियाँ और गंभीर निबंध भी उन्होंने लिखे हैं। प्रसाद-साहित्य में पाठक को भारतीय संस्कृति से निकटतम साक्षात्कार होता है। “कामायनी” उनके द्वारा सृजित एक ऐसा ही उच्च कोटि का महाकाव्य है। जिसकी कथा के संबंध में स्वयं प्रसाद लिखते हैं –

 

       “यह आख्यान इतना प्राचीन है कि इतिहास में रूपक का भी अद्भुत मिश्रण है। इसलिए मनु , श्रद्धा ,इड़ा आदि अपना ऐतिहासिक अस्तित्व रखते हुए भी सांकेतिक अर्थ की भी अभिव्यक्ति करें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”

 

स्थूल रूप में कामायनी का प्रारंभ देव संस्कृति के विनाश से होता है और यह विनाश भीषण जल-प्लावन से हुआ, जिसमें केवल मनु जीवित बचे क्योंकि वह देव सृष्टि के अंतिम अवशेष थे। जल प्लावन समाप्त होने पर मानव जाति का विकास हुआ- जिसके मूल में चिंता थी। उसके कारण ही मानव में जरा और मृत्यु की अनुभूति जागी। एक दिन काम की पुत्री श्रद्धा मनु के समीप आई। वे दोनों साथ-साथ रहने लगे। भावी शिशु की कल्पना में निमग्न श्रद्धा को एक दिन मनु ईर्ष्यावश छोड़कर चल दिए। उनकी भेंट सारस्वत प्रदेश की अधिष्ठात्री इड़ा से हुई। इड़ा ने उन्हें शासन का भार सौंप दिया। पर इड़ा पर मनु के अत्याचार और आधिपत्य भाव को देखकर, वहाँ की प्रजा ने।

 

        एक दिन विद्रोह कर दिया। मनु आहत हो गए। तभी श्रद्धा उन्हें खोजती हुई वहाँ आ पहुची। उसका पुत्र मानव भी साथ में था। किन्तु मनु पश्चाताप में डुबे थे। वह उन सबको छोड़कर फिर वहाँ से चल दिए । श्रद्धा ने मानव को इड़ा के पास छोड़ दिया। अपने मनु की खोज में चल दी। उसकी खोज सफ़ल हुई मनु उसे मिल गए। अंत में सारस्वत प्रदेश के सभी प्राणी कैलास पर्वत पर जाकर श्रद्धा और मनु के दर्शन करते हैं।

यह भी पढ़े-  कबीर दास || जीवन परिचय : kabir das jeevan parichay


कामायनी आदि मानव की कथा तो है ही, पर इसके माध्यम से प्रसाद जी ने अपने युग के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को भी उभारा है। चिंता से आरम्भ कर आनंद तक यह महाकाव्य पंद्रह सर्गो में विभक्त है। यों तो कथावस्तु वेद, उपनिषद् , पुराण आदि से प्रेरित है किंतु कवि ने मुख्य आधार शतपथ ब्राह्मण को स्वीकार किया है। शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड आठवें अध्याय से जल-प्लावन संबंधी उल्लेखों का संकलन कर प्रसाद ने इस काव्य का कथानक निर्मित किया है। साथ ही उपनिषद् और पुराणों में मनु और श्रद्धा का जो रूपक वर्णित है उन्होंने उसे भी अस्वीकार नहीं किया। चारों ओर जल ही जल था और तरुण तपस्वीदेवताओं की श्मशान-भूमि में साधना कर रहा था। प्रलय का जल धीरे धीरे उतरने लगा। नौका महावट से बँधी थी। उस पुरुष के हृदय में चिंता का उदय होता है। उसे देव सृष्टि का स्मरण हो आता है। आरंभिक सर्ग में जल-प्लावन, अमरत्व की अपूर्णता, जीवन और मृत्यु की समस्या पर विचार किया गया है।कामायनीकी कथा के चार भाग हैं –


(1)
प्रलय और मनु प्रसंग

(2) श्रद्धा-मनु सम्मिलन और जन्म प्रसंग

(3) इड़ा-मनु संयोग और सारस्वत प्रदेश आख्यान

(4) मनु का त्रिपुर दर्शन और कैलाश यात्रा प्रसंग।


किन्तु प्रसाद जी ने इस महाकाव्य का निर्माण 15 सर्गों में विभाजित करके किया है। कामायनीका सर्ग विभाजन निम्न प्रकार है- 1.चिंतन २.आशा 3.श्रद्धा 4.काम 5.वासना 6.लज्जा 7.कर्म 8.ईर्ष्या 9.इड़ा 10.स्वप्न 11.संघर्ष 12.निर्वेद 13.दर्शन 14.रहस्य 15.आनंद

 

असल में यहाँ मनु मन के प्रतीक हैंउसके समान ही अस्थिर मति है। श्रद्धा और इड़ा क्रमश: उसके हदय और बुद्धिपक्ष हैं। पहले श्रद्धा की प्रेरणा से वह तपस्वी जीवन त्याग कर प्रेम और प्रणय का मार्ग अपनाते हैं। फिर असुर पुरोहित आकुलि और किलात के बहकावे में आकर, हिंसावृत्ति और स्वेच्छा के वशीभूत हो, श्रद्धा का सुख-साधनपूर्ण साथ छोड देते हैं। भटकते हुए सारस्वत प्रदेश में जा पहुचते हैं। श्रद्धा के प्रति मनु के दुर्व्यवहार से क्षुब्ध काम का अभिशाप सुन हताश हो किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। इड़ा के ससर्ग से बुद्धि की शरण में जा भौतिक विकास की राह पर चलते हैं, वहाँ भी संयम के अभाव में इड़ा पर अत्याचार करने लगते हैं। प्रजा से उनका

यह भी पढ़े-  महात्मा गाँधी ।। जीवन परिचय : mahatma gandhi jeevan parichay in hindi

 

सघर्ष होता है। इस संघर्ष में पराजित और प्रकृति के प्रकोप से विक्षुब्ध मनु जीवन से विरक्त हो पलायन करते हैं। अंत में श्रद्धा का अनुसरण करते हुए आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। मनु अंतिम समय में श्रद्धा की सहायता से ही उच्च भाव-भूमि पर पहुँच जाते हैं। त्याग और बलिदान का जो संदेश वह सबको देती है, उसका पालन स्वयं जीवन-भर करती है। प्राणिमात्र के सुख के लिए काम करना ही श्रेयस्कर है। वह बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का सिद्धांत मानती हुई कहती है –

 

औरों को हसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ


जीवन के सूखे पतझड़ में श्रद्धा हरियाली भर देती है। मानव के पूरक रूप में वह आधुनिक नारी प्रतीत होती है। मनु कृतज्ञता से भर उठते हैं और कहते हैं- कि तुम्हीं ने मुझे स्नेह दिखाया – हृदय बन रहा था सीपी सा तुम स्वाती की बून्द बनीं मानस शतदल झूम उठा जब तुम उसमें मकरंद बनीं ।


प्रसाद ने अपने काव्यों में रूढ़ियों का उल्लंघन करते हुए कथ्य और शिल्प के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किए। उनके लिखे मुक्तक , खंडकाव्य एवं महाकाव्य , काव्यरूप सम्बन्धि उनकी प्रयोग क्षमता के परिचायक हैं।


कामायनीभी विशिष्ट शैली का महाकाव्य है। उसकी गरिमा उसके युगबोध, पुष्ट चिंतन, महत् उद्देश्य और प्रौड़ शिल्प में हैं। उसमें पूर्ववर्ती प्राचीन महाकाव्यों जैसा वर्णनात्मक विस्तार नहीं है, पर सर्वत्र गहन अनुभूति से पाठक सराबोर हो उठता है। प्रसाद के सम्पूर्ण चिंतन-मनन को समेटने वाली कामायनी के माध्यम से कवि ने मानव को महान् संदेश दिया है । तप नहीं केवल जीवन-सत्य के रूप में कवि ने मानव जीवन में प्रेम की महत्ता घोषित की है। इस जगत् में प्रेम ही एकमात्र श्रेय और प्रेय है। प्रेम मानव और केवल मानव की ही विभूति है। मानवेतर प्राणी, चाहे वे चिरविलासी देव हों, चाहे देह और भौतिकता में डूबे असुर, दैत्य और दानव हों, चाहे किन्नर या गंधर्व हों, पशु पक्षी हों, प्रेम की प्रतिष्ठा केवल मानव ने की है। लेकिन प्रसाद ने प्रेम में समरसता और समन्वय का प्रतिपादन किया है। संसार के द्वन्दों का उद्गम शाश्वत सत्य है- फूल के साथ काँटे, भाव के साथ अभाव, सुख के साथ दुख और रात्रि के साथ दिन – यह चक्र चलता रहता है।

यह भी पढ़े-  रीढ़ की हड्डी समीक्षा : NCERT Solutions CLASS 9 Reedh ki Haddi summary


 मानव इनमें से एक को चुन लेता है, दूसरे को छोड़ देता है। यही उसके विषाद का कारण होता है। अनेक स्थलों पर प्रसाद साक्षात् चित्र निर्मित कर देते हैं। मानव की चित्तवृत्तियों का पात्र के रूप में अवतरण और उन्हें मूर्त कर देना असाधारण उपलब्धि है। लज्जा, सौंदर्य, श्रद्धा, इड़ा का मानव रूप में चित्रण हिंदी साहित्य की अनमोल विरासत है। प्रसादजी की कामायनी पाठक को शक्ति देती है, पाठक मनु के जीवन से सीखता है कि अधिकार की चाह विष है। चाह हो तो केवल सबके कल्याण की। कवि प्रसाद जी ने वास्तव में कामायनीमे किसी नायक विशेष की कथा नहीं कही है बल्कि सांकेतिक रूप में कवी ने मानव की कथा कही है इसलिए प्रसाद जी की अन्य रचनाओं से उत्कृष्टतम काव्य कामायनी माना गया है। कवि एवं रचनाकार के रूप में कवि प्रसाद जी ने कड़ी एवं लम्बी यात्रा तथा तपस्या की तब कामायनी जैसी रचना का निर्माण हुआ था

Leave a Comment

Your email address will not be published.

Scroll to Top