Thursday, October 6, 2022
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कबीर दास || जीवन परिचय : kabir das jeevan parichay

कबीर दास || जीवन परिचय : Kabir Das Jeevan Parichay

कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगतगुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा तालाब के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसीने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नामक देवाङ कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से हिंदु धर्म की बातें मालूम हुई। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल राम-रामशब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- हम काशी में प्रकट भये हैं रामानन्द चेताये।

जन्मस्थान

कबीर के जन्मस्थान के संबंध में मत हैं : काशी, मगहर के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि कबीर ने अपनी रचना में वहाँ का उल्लेख किया है : “पहिले दरसन मगहर पायो पुनि कासी बसे आई अर्थात् काशी में रहने से पहले उन्होने मगहर देखा। मगहर आजकल वाराणसी के निकट ही है और वहाँ कबीर का मक़बरा भी है।

शिक्षा

कबीर बड़े होने लगे। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- अपनी अवस्था के बालकों से एकदम भिन्न रहते थे। मदरसे भेजने लायक साधन पिता-माता के पास नहीं थे। जिसे हर दिन भोजन के लिए ही चिंता रहती हो, उस पिता के मन में कबीर को पढ़ाने का विचार भी न उठा होगा। यही कारण है कि वे किताबी विद्या प्राप्त न कर सके।

मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।

पोथी पढ़ी- पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोई।

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

 

वैवाहिक जीवन

          कबीर का विवाह वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या लोईके साथ हुआ था। कबीर को कमाल और कमाली नाम की दो संतान भी थी। जबकि कबीर को कबीर पंथ में, बाल- ब्रह्मचारी और विराणी माना जाता है। इस पथ के अनुसार कामात्य उसका शिष्य था और कमाली तथा लोई उनकी शिष्या। लोई शब्द का प्रयोग कबीर ने एक जगह कम्बल के रुप में भी किया है। वस्तुतः कबीर की पत्नी और संतान दोनों थे। एक जगह लोई को पुकार कर कबीर कहते हैं :-

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कहत कबीर सुनह रे लोई।

हरि बिन राखन हार न कोई।।

         

          यह हो सकता हो कि पहले लोई पत्नी होगी, बाद में कबीर ने इसे शिष्या बना लिया हो।

आरंभ से ही कबीर हिन्दू भाव की उपासना की ओर आकर्षित हो रहे थे। अतः उन दिनों जबकि रामानंद जी की बड़ी धूम थी, अवश्य वे उनके सत्संग में भी सम्मिलित होते रहे होंगे। रामानुज की शिष्य परंपरा में होते हुए भी रामानंद जी भक्ति का एक अलग उदार मार्ग निकाल रहे थे जिसमें जाति-पाति का भेद और खानपान का आचार दूर कर दिया गया था। अत: इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को राम नामरामानंद जी से ही प्राप्त हुआ। पर आगे चलकर कबीर के रामरामानंद के राम से भिन्न हो गए । अत: उनकी प्रवृत्ति निर्गुण उपासना की ओर दृढ़ हुई।

संत” शब्द संस्कृत “सत्” के प्रथमा का बहुवचनांत रूप है, जिसका अर्थ होता है सज्जन और धार्मिक व्यक्ति। हिंदी में साधु पुरुषों के लिए यह शब्द व्यवहार में आया। कबीर, सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास आदि पुराने कवियों ने इस शब्द का व्यवहार साधु और परोपकारी, पुरुष के अर्थ में बहुलांश: किया है और उसके लक्षण भी दिए हैं। यह आवश्यक नहीं कि संत उसे ही कहा जाए जो निर्गुण ब्रह्म का उपासक हो। इसके अंतर्गत लोकमंगलविधायी सभी सत्पुरुष आ जाते हैं, किंतु आधुनिक कतिपय साहित्यकारों ने निर्गुणिए भक्तों को ही “संत” की अभिधा दे दी और अब यह शब्द उसी वर्ग में चल पड़ा है।

मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने एक साखी हाजिर कर दी-

 

पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौंपहार।

था ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार ।।

 

विचार उन्होंने जो व्यंग्यात्मक प्रहार किए और अपने को सभी ऋषियों मुनियों से आचारवान् एवं सच्चरित्र घोषित किया, उसके प्रभाव से समाज का निम्नवर्ग अप्रभावित न रह सका एवं आधुनिक विदेशी सभ्यता में दीक्षित एवं भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति से प्रमुख कतिपय जनों को उसमें सच्ची मानवता का संदेश सुनने को मिला।

          रवींद्रनाथ ठाकुर ने बरह्मसमाजी विचारों से मेल खाने के कारण कबीर की बानियों का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया और उससे आजीवन प्रभावित भी रहे। कबीर की रचना मुख्यत: साखियों और पर्दों में हुई हैं। इनमें उनकी स्वानुभूतियाँ तीव रूप में सामने आई हैं। संतपरंपरा में हिंदी के पहले संत साहित्य भ्रष्टा जयदेव हैं। ये गीतगोविंदकार जयदेव से भिन्न हैं। सेन भाई, रैदास, पीपा, धन्ना, नानकदेव, अमरदास, धर्मदास, दादूदयाल, गरीबदास, सुंदरदास, दरियादास, कबीर की प्रेम साधना है ।

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व्यक्तित्व

हिन्दी साहित्य के हज़ार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। महिमा में यह व्यक्तित्व केवलं एक ही प्रतिदवन्दवी जानता है, तुलसीदास। परन्तु तुलसीदास और कबीर के व्यक्तित्व में बड़ा अन्तर था। यद्यपि दोनों ही भक्त थे, परंतु दोनों स्वभाव, संस्कार और दृष्टिकोण में एकदम भिन्न थे। मस्ती, फ़क्कड़ाना स्वभाव और सबकुछ को झाडू-फटकार कर चल देने वाले तेज़ ने कबीर को हिन्दी-साहित्य का अद्वितीय व्यक्ति बना दिया है। उसी ने कबीर की वाणियों में अनन्य-असाधारण जीवन रस भर दिया है।

इसी व्यक्तित्व के कारण कबीर की उक्तियाँ श्रोता को बलपूर्वक आकृष्ट करती हैं। इसी व्यक्तित्व के आकर्षण को सहृदय समालोचक सम्भाल नहीं पाता और रीझकर कबीर को कविकहने में संतोष पाता है। ऐसे आकर्षक वक्ता को कविन कहा जाए तो और क्या कहा जाए? परन्तु यह भूल नहीं जाना चाहिए कि यह कवि रूप में मिली हुई वस्त्र है।अन्यान्य संतों से विशेष बना देता है।

कृतियाँ

संत कबीर ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।

कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ है। विशेष जी एच. वेस्टवकॉट ने कबीर के 74 ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड, ने हिंदुत्वमें 71 पुस्तकें गिनायी है| कबीर की वाणी का संग्रह बीजकके नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं-

साखी ,सबद ,रमैनी

साहित्यिक परिचय

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और असत्य व अन्याय की पोल खोल धज्जियाँ उड़ाता चला गया। कबीर का अनुभूत सत्य अंधविश्वासों पर बारूदी पलीता था। सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है।

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कबीरदास की भाषा- शैली

कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसी रूप में कहलवा लिया भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार-सी नज़र आती है। उसमें मानों ऐसी हिम्मत ही नहीं है कि इस लापरवाह फक्कड़ कि किसी फ़रमाइश को नहीं कर सके।

          वाणी के ऐसे बादशाह को साहित्य-रसिक काव्यानंद का आस्वादन कराने वाला समझे तो उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। कबीर ने जिन तत्त्वों को अपनी रचना से ध्वनित करना चाहा है, उसके लिए कबीर की भाषा से ज्यादा साफ़ और ज़ोरदार भाषा की सम्भावना भी नहीं है और ज़रूरत भी नहीं है।

कबीर दर्शन

          कबीर की कविता जीवन के बारे में अपने दर्शन का एक प्रतिबिंब है. उनके लेखन को मुख्य रूप से पुनर्जन्म और कर्म की अवधारणा पर आधारित थे. कबीर के दर्शन जीवन के बारे में बहुत स्पष्ट था. वह एक बहुत ही साधारण तरीके से जीवन जीने में विश्वास करते थे. वह परमेश्वर की एकता की अवधारणा में एक मजबूत विश्वास था. उसने कोई बोले राम राम कोई खुदाई की धारणा की वकालत मूल विचार के लिए संदेश है कि चाहे आप हिंदू भगवान या मुस्लिम भगवान के नाम का जाप, तथ्य यह है कि वहाँ केवल एक ही परमेश्वर है जो इस खूबसूरत दुनिया के निर्माता है ।

कबीरदास की महिमा

जो लोग इन बातों से ही कबीरदास की महिमा का विचार करते हैं वे केवल सतह पर ही चक्कर काटते हैं। कबीरदास एक जबरदस्त क्रान्तिकारी पुरुष थे। उनके कथन की ज्योति जो इतने क्षेत्रों को उदभासित कर सकी है  मामूली शक्तिमत्ता की परिचायिका नहीं है। परन्तु यह समझना कि उदभासित पदार्थ ही ज्योति है, बड़ी भारी गलती है। उदभासित पदार्थ ज्योति की ओर इशारा करते हैं और ज्योति किधर और कहाँ पर है, इस बात का निर्देश देते हैं। ऊपर-ऊपर, सतह पर चक्कर काटने वाले समुद्र भले ही पार कर जाएँ, पर उसकी गहराई की थाह नहीं पा सकते।

मृत्यु

कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गयी, तब लोगो ने वहाँ फूलो का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फुल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि हैं। जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन् 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1442 को मानते हैं ।

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