Jonk Ekanki | जोंक एकांकी उपेन्द्रनाथ अश्क

Jonk Ekanki | जोंक एकांकी उपेन्द्रनाथ अश्क

jonk ekanki upendranath ashk | जोंक एकांकी उपेन्द्रनाथ अश्क

Jonk Ekanki | जोंक एकांकी उपेन्द्रनाथ अश्क

          आज हम आप लोगों को जोंक एकांकी  (Jonk Ekanki) के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि उपेन्द्रनाथ अश्क  (Upendranath Ashk) द्वारा लिखित है। इसके अतिरिक्त यदि आपको और भी हिन्दी से सम्बन्धित पोस्ट चाहिए तो आप हमारे website के Top Menu में जाकर प्राप्त कर सकते है।

जोंक एकांकी  (Jonk Ekanki)

‘जोंक’ (Jonk) श्री उपेन्द्रनाथ अश्क’ (Upendranath Ashk) का एक सुन्दर कलात्मक एकांकी ( Ekanki ) है। उसके द्वारा लेखक ने हमारे सामाजिक जीवन के एक अछूते पहलू पर प्रकाश डाला है। मध्यमवर्गीय परिवार में ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की निकृष्ट मनोवृत्ति वाले लोग कैसी परिस्थिति पैदा कर देते हैं-उसका सरस चित्रण प्रस्तुत एकांकी ( Ekanki ) में हुआ है। 

          भोलानाथ और आनंद-दोनों मित्र हैं। आनंद ने अभी अभी एम.ए. पास किया है और एक कालिज में पढाने लगा है। आजकल वह किसी कालिज के प्रिंसिपल से मिलने आया है और अपने मित्र भोलानाथ के यहाँ ठहरा है। भोलानाथ मैट्रिक तक पढ़ा हुआ है। विद्यार्थी अवस्था में उसे नाटकों का बड़ा चाव था। खासकर मास्टर रहमत नामक अभिनेता की उस वक्त धूम मची थी और भोलानाथ उसके अज्ञात प्रशंसकों में से एक थे। अपनी गली के एक रसीली आवाज बाले लडके से नाटकों के गाने सुनकर तब वे मजा लिया करते थे। उस मास्टर रहमत का दाँया हाथ माना जानेवाला कोई एक बनवारी नामक आदमी था जो मास्टर रहमत के निजी दोस्त के नाते उनकी एक्टिग-आदर्ते आदि की चर्चा बड़े रस से किया करता था। एक दिन भोलानाथ डॉक्टर किशोरीलाल के वहाँ गया था, वहीं उसकी भेंट उस बनवारीलाल से हो गई । बचपन में नाटकों का बहुत शौक था और यहाँ जब नाटकों का जिक्र छिडा तो बनवारी लाल ने मास्टर रहमत की प्रशंसा के पुल बाँध दिये। 

          कौतूहलवश भोलानाथ ने भी उसकी कुछ बातें सुनी और हाँ हू कर दिया। बस इतनी सी भोलानाथ की उस बनवारी से पहचान थी। 

          उस बात को बरसों बीत गये। शादी करने के तुरन्त बाद भोलानाथ शहर में नौकरी की तलाश से दौड-धूप कर रहा था कि रास्ते में यह बनवारी मिल गया। तो ‘चार आँखों की शरम’ रखने के लिए घर पर पानी पीने आने का आग्रह करना पड़ा। बनवारी भी एक ही आदमी था-बिहारीलाल के यहाँ जाने में देर होगी-कहता हुआ वह भोलानाथ के साथ चल पडा । भोलानाथ नौकरी के सिलसिले में किसी महत्व की मुलाकात को जा रहा था अतः वह उतावल में था पर यह खिसकने का नाम नहीं लेता था । बनवारी ने भोलानाथ की पत्नी से तुम तो नुवाँ शहर की हो. तब तो हमारी बहन हुई कह कर घनिष्ट नाता भी जोड़ लिया और आँगन में चारपाई पर लेट गया। पूरे सात दिनों तक बनवारी ने उनका पिण्ड न छोडा और जब गया तो ऊपर से पाँच रूपये उधार लेता गया । 

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          आज वही बनवारी फिर मेहमान बनकर भोलानाथ के यहाँ पुनः आ गया था।

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          भोलानाथ ने सोचा कि इस समस्या में शायद आनंद कुछ सहायता कर सकेगा । सात दिनों तक वह अनचाहा महेमान बना रह धुका था, इससे भोलानाथ बाज आ गया था, अतः इस बार उसके आते ही वह घबरा गया था। इतने में कमला आ धमकती है, मेहमान उसे तरह-तरह के हुक्म देकर तंग कर रहा है और वह बहुत चिढ गई है वह पूछती है कि भोलानाथ उसे साफ-साफ पता क्यों नहीं बता देता, पर मुरव्वत के मारे भोलानाथ और आनंद दोनों यह साहस नहीं कर पाते । 

          आनंद उसे निकालने के सामान्य तरीके सोचता है पर भोलानाथ कहता है कि ऐसे उपायों से काम नहीं चलेगा, यह पूरा जोंक (Jonk) है-ऐसे नहीं जायेगा। कोई ऐसी ठोस तरकीब सोचनी चाहिये जिससे वह लोहा न ले सके । आखिर आनंद कमला को बीमार बनने का तरीका बताता है। बनवारी हाथ में लौकियाँ लिए आता है। भोलानाथ बताता है कि कमला को हिस्टीरिया की वजह से दौरा पड़ गया है, अब उसे अस्पताल ले जाना होगा । आनंद उपवास का बहाना करता है, तब बनवारी स्वयं रसोई घर में चला जाता है और कहता है कि खाना मैं स्वयं पकाऊँगा। और लौकी की खीर हिस्टीरिया पर बडा लाभ करती है, सो थोडी कमलांजी को भी खिलायेंगे। 

          भोलानाथ ने कहा यह पूरा जोंक (Jonk) है, ऐसे नहीं जायेगा कोई और तरकीब भिडाओ, पांच आने खर्च कर देगा तो क्या हुआ गत वर्ष जाते जाते मुझसे पाँच रूपये ले गया था। . 

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          इस पाँच रूपयों की बात पर कमला झल्ला उठी। वह कहने लगी मुझे मेरे मैके छोड आओ, मैं तुम्हारे ऐसे ढंग और ऐसे दोस्तों से बाज आ गयी। मैके जाने की बात पर आनंद को एक नया तरीका सूझ गया। उसने भोलानाथ और कमला को पडोश में भेज दिया, जब बनवारी आया तो उसने बताया कि कमला की तबियत बहुत खराब हो जाने से भोलानाथ उसे मैके छोडने गये हैं मुझे भी बाहर जाना है। पर बनवारी के आगे उसकी एक न चली । घष्टता से वह रसोई घर में चला गया और कहता गया जल्दी आ जाइयेगा । गर्म खीर जैसा खाने में मजा नहीं।

          आनंद मजबूर हो गया। इधर बनवारी ने खूब खीर पकायी और आनंद ने भी भर पेट खाया, जब बनवारी अंदर खा रहा था तब भोलानाथ पडोश से आकर कहने लगा उधर हम उसके जाने की बाट जोह रहे है और तुम मजे से खीर खा रहे हो। आनंद उसकी रसोई कला के बखान करता हुआ बताने लगा कि वह एक ही आदमी है-ऐसे नहीं जायेगा । बनवारी पान लेने चला गया। 

          आखिर दोनों ने निश्चय किया कि जब तक वह पान लेकर वापस आये, घर के मुख्य द्वार पर ही ताला बंद करके वे चले जायें। पर आनंद ने भरपेट खाया था अतः उसकी आँखें तन्द्रिल हो रही थीं। वह कमरे के भीतर सो गया और सारा सामान अंदर करके भोलानाथ ने बनवारी का हेन्डबेग बाहर रख दिया, फिर घर पर ताला लगाकर चल दिया। बनवारी लौटा तो.सारी स्थिति समझ गया, ढीठता से हँसते हँसते उसने दूसरे द्वार के पास चारपाई बिछा दी और लम्बी तानकर सो गया। 

          कमरे के अंदर सोया आनंद जब जागा तो साढे तीन बजने जा रहे थे। उसे प्रिन्सिपल से मिलने जाना था और कमरे का दरवाजां जो बाहर की ओर खुलता था उसी से सटकर बनवारी सो रहा था। आखिरकार तिपाई पर चढकर वह रोशनदान से नीचे उतरने लगा, तभी बनवारी जाग गया, आनंद को पहचानते हुए भी उसने चोर… चोर का शोर मचाकर कुछ लोगों को इकट्ठा कर दिया जब तक आनंद कोई स्पष्टता करे उसे जेंटलमैन बेकार चोर करार कर दिया गया। एक पंजाबी ने तो उसे दा-चार थप्पड भी जमा दिये, भालानाथ ने जान बूझकर आनद का चार बना दिया फिर वह थान में पुलिस को बुलाने चला गया जिससे उचित कारवाई की जा सके। 

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          इसी वक्त परेशान भोलानाथ और कमला वापस आ गये । सारा हो हल्ला देखकर भोलानाथ हैरानी में पड गया, आनंद से सारा हाल जानकर वह गुस्से से भर उठा, क्योंकि इस सारे कौभांड का कारण अभी तक टला नहीं था। सब को हटाकर भोलानाथ परिस्थिति सम्हाल रहा था कि थाने में गया बनवारी वापस आ गया और जैसे कुछ जानता न हो वैसे मुँह बनाकर कहने लगा-यह विचित्र दोस्त हैं आपके ! यह तो सब कुछ उठाकर ही ले चले थे। भोलानाथ ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया, कमला की तबियत का बहाना बताकर वह गुरुदास पुर जाने की तैयारी करने लगा और आनंद को भी साथ चलने को कहा । गुरुदासपुर में कमला के भाई म्युनिसीपालिटी में हैडक्लर्क हैं, यह सुनकर बनवारी भी उन सभी के साथ जाने को तैयार हो गया-यह कहकर कि यह आपने अच्छी खबर सुनाई । मैं स्वयं परेशान था। वहाँ म्युनिसिपल कमेटी में मुझे काम है। गुरुदासपुर में मेरा कोई परिचित नहीं था। अब आप साथ होंगे तो सब कुछ सुगमता से हो जायेगा। और इस तरह उस जोंक (Jonk) को निकालने की उनकी कोई कारवाई कारगर न हुई । 

            इस पोस्ट के माध्यम से हम जोंक एकांकी  (Jonk Ekanki) के बारे में जाने जो कि उपेन्द्रनाथ अश्क  (Upendranath Ashk)  द्वारा लिखित हैं। उम्मीद करती हूँ कि आपको हमारा यह पोस्ट पसंद आया होगा। पोस्ट अच्छा लगा तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूले। किसी भी तरह का प्रश्न हो तो आप हमसे कमेन्ट बॉक्स में पूछ सकतें हैं। साथ ही हमारे Blogs को Follow करे जिससे आपको हमारे हर नए पोस्ट कि Notification मिलते रहे।

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