इस जल प्रलय में अध्याय-1 कृतिका भाग-1 : NCERT Hindi Book for Class-9 » Education 4 India
kritika bhag 1 class 9 iss jal pralay mein

इस जल प्रलय में अध्याय-1 कृतिका भाग-1 : NCERT Hindi Book for Class-9

NCERT Hindi Book for Class-9 (Kritika Bhag-1) Chapter-1
Iss Jal Pralay Mein
अध्याय-1 इस जल प्रलय में (कृतिका भाग-1)

इस जल प्रलय में

          

           
          इस जल प्रलय में फणीश्वरनाथ रेणु ( Iss Jal Pralay Mein by Phanishwar Nath Renu ) द्वारा लिखित रिपोतार्ज है, जिसमें उन्होंने सन् 1975 0 में पटना में आई प्रलयंकारी बाढ़ का आँखों देखे हाल का वर्णन किया है।

           मेरा गाँव ऐसे इलाके में है जहाँ हर साल पश्चिम, पूरब और दक्षिण की कोसी, पनार, महानंदा और गंगा की बाढ़ से पीड़ित प्राणियों के समूह आकर पनाह लेते हैं, सावन-भादो में ट्रेन की खिड़कियों से विशाल और सपाट परती पर गाय, बैल, भैंस, बकरों के हज़ारों झुंड-मुंड देखकर ही लोग बाढ़ की विभीषिका का अंदाज़ा लगाते हैं।

          परती क्षेत्र में जन्म लेने के कारण अपने गाँव के अधिकांश लोगों की तरह मैं भी तैरना नहीं जानता। किंतु दस वर्ष की उम्र से पिछले साल तक-ब्वॉय स्काउट, स्वयंसेवक, राजनीतिक कार्यकर्ता अथवा रिलीफ़वर्कर की हैसियत से बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों में काम करता रहा हूँ और लिखने की बात? हाईस्कूल में बाढ़ पर लेख लिखकर प्रथम पुरस्कार पाने से लेकर-धर्मयुग में कथा-दशकके अंतर्गत बाढ़ की पुरानी कहानी को नए पाठ के साथ प्रस्तुत कर चुका हूँ। जय गंगा (1947), डायन कोसी (1948), हड्डियों का पुल (1948) आदि छुटपुट रिपोर्ताज के अलावा मेरे कई उपन्यासों में बाढ़ की विनाश-लीलाओं के अनेक चित्र अंकित हुए हैं। किंतु, गाँव में रहते हुए बाढ़ से घिरने, बहने, भंसने और भोगने का अनुभव कभी नहीं हुआ। वह तो पटना शहर में सन् 1967 में ही हुआ, जब अट्ठारह घंटे की अविराम वृष्टि के कारण पुनपुन का पानी राजेंद्रनगर, कंकड़बाग तथा अन्य निचले हिस्सों में घुस आया था। अर्थात बाढ़ को मैंने भोगा है, शहरी आदमी की हैसियत से। इसीलिए इस बार जब बाढ़ का पानी प्रवेश करने लगा, पटना का पश्चिमी इलाका छातीभर पानी में डूब गया तो हम घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी और कांपोज़ की गोलियाँ जमाकर बैठ गए और प्रतीक्षा करने लगे।

          सुबह सुना, राजभवन और मुख्यमंत्री-निवास प्लावित हो गया है। दोपहर में सूचना मिली, गोलघर जल से घिर गया है! (यों, सूचना बाँग्ला में इस वाक्य से मिली थी-जानो! गोलघर डूबे गेछे!‘) और पाँच बजे जब कॉफ़ी हाउस जाने के लिए (तथा शहर का हाल मालूम करने) निकला तो रिक्शेवाले ने हँसकर कहा-अब कहाँ जाइएगा? कॉफ़ी हाउस में तो अबलेपानी आ गया होगा।

          चलो, पानी कैसे घुस गया है, वही देखना है।कहकर हम रिक्शा पर बैठ गए। साथ में नयी कविता के एक विशेषज्ञ-व्याख्याता-आचार्य-कवि मित्र थे, जो मेरी अनवरत-अनर्गल -अनगढ़ गद्यमय स्वगतोक्ति से कभी बोर नहीं होते (धन्य हैं!)।

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          मोटर, स्कूटर, ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, ट्रक, टमटम, साइकिल, रिक्शा पर और पैदल लोग पानी देखने जा रहे हैं, लोग पानी देखकर लौट रहे हैं। देखने वालों की आँखों में, जुबान पर एक ही जिज्ञासा-“पानी कहाँ तक आ गया है?” देखकर लौटते हुए लोगों की बातचीत-“फ्रेजर रोड पर आ गया! आ गया क्या, पार कर गया। श्रीकृष्णापुरी, पाटलिपुत्र कालोनी, बोरिंग रोड? इंडस्ट्रियल एरिया का कहीं पता नहींअब भट्टाचार्जी रोड पर पानी आ गया होगा।छातीभर पानी है। वीमेंस कॉलेज के पासडुबावपानीहै।आ रहा है!…आ गया!!…घुस गयाडूब गयाडूब गयाबह गया!” 

          हम जब कॉफ़ी हाउस के पास पहुँचे, कॉफ़ी हाउस बंद कर दिया गया था। सड़क के एक किनारे एक मोटी डोरी की शक्ल में गेरुआझागफेन में उलझा पानी तेज़ी से सरकता आ रहा था। मैंने कहा-“आचार्य जी, आगे जाने की ज़रूरत नहीं। वो देखिएआ रहा हैमृत्यु का तरल दूत!” 

          आतंक के मारे मेरे दोनों हाथ बरबस जुड़ गए और सभय प्रणामनिवेदन में मेरे मुँह से कुछ अस्फुट शब्द निकले (हाँ, मैं बहुत कायर और डरपोक हूँ!) 

          रिक्शावाला बहादुर है कहता है-‘चलिए न, थोड़ा और आगे!’ भीड़ का एक आदमी बोला-“ए रिक्शा, करेंट बहुत तेज़ है। आगे मत जाओ।” 

          मैंने रिक्शावाले से अनुनय भरे स्वर में कहा-“लौटा ले भैया। आगे बढ़ने की ज़रूरत नहीं।” 

          रिक्शा मोड़कर हम अप्सरासिनेमा हॉल (सिनेमाशो बंद!) के बगल से गांधी मैदान की ओर चले। पैलेस होटल और इंडियन एयरलाइंस दफ़्तर के सामने पानी भर रहा था। पानी की तेज़ धारा पर लालहरेनियनविज्ञापनों की परछाइयाँ सैकड़ों रंगीन साँपों की सृष्टि कर रही थीं। गांधी मैदान की रेलिंग के सहारे हजारों लोग खड़े देख रहे थे। दशहरा के दिन रामलीला केरामके रथ की प्रतीक्षा में जितने लोग रहते हैं, उससे कम नहीं थेगांधी मैदान के आनंदउत्सव, सभासम्मेलन और खेलकूद की सारी स्मृतियों पर धीरेधीरे एक गैरिक आवरण आच्छादित हो रहा था। हरियाली पर शनैःशनैः पानी फिरते देखने का अनुभव सर्वथा नया था। इसी बीच एक अधेड़, मुस्टंड और गँवार ज़ोरज़ोर से बोल उठा-“ईह! जब दानापुर डूब रहा था तो पटनियाँ बाबू लोग उलटकर देखने भी नहीं गएअब बूझो!” 

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          मैंने अपने आचार्यकवि मित्र से कहा-” पहचान लीजिए। यही है वहआम आदमी‘, जिसकी खोज हर साहित्यिक गोष्ठियों में होती रहती है। उसके वक्तव्य मेंदानापुरके बदलेउत्तर बिहारअथवा कोई भी बाढ़ग्रस्त ग्रामीण क्षेत्र जोड़ दीजिए…” 

          शाम के साढ़े सात बज चुके और आकाशवाणी के पटनाकेंद्र से स्थानीय समाचार प्रसारित हो रहा था। पान की दुकानों के सामने खड़े लोग, चुपचाप, उत्कर्ण होकर सुन रहे थे… 

          पानी हमारे स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुँच चुका है और किसी भी क्षण स्टूडियो में प्रवेश कर सकता है। 

          समाचार दिल दहलाने वाला था। कलेजा धड़क उठा। मित्र के चेहरे पर भी आतंक की कई रेखाएँ उभरीं। किंतु हम तुरंत ही सहज हो गए; यानी चेहरे पर चेष्टा करके सहजता ले आए, क्योंकि हमारे चारों ओर कहीं कोई परेशान नज़र नहीं आ रहा था। पानी देखकर लौटते हुए लोग आम दिनों की तरह हँसबोल रहे थे; बल्कि आज तनिक अधिक ही उत्साहित थे। हाँ, दुकानों में थोड़ी हड़बड़ी थी। नीचे के सामान ऊपर किए जा रहे थे। रिक्शा, टमटम, ट्रक और टेम्पो पर सामान लादे जा रहे थे। खरीदबिक्री बंद हो चुकी थी। पानवालों की बिक्री अचानक बढ़ गई थी। आसन्न संकट से कोई प्राणी आतंकित नहीं दिख रहा था। 

          पानवाले के आदमकद आईने में उतने लोगों के बीच हमारी ही सूरतेंमुहर्रमीनज़र आ रही थीं। मुझे लगा, अब हम यहाँ थोड़ी देर भी ठहरेंगे तो वहाँ खड़े लोग किसी भी क्षण ठठाकर हम पर हँस सकते थे-“ज़रा इन बुज़दिलों का हुलिया देखो!” क्योंकि वहाँ ऐसी ही बातें चारों ओर से उछाली जा रही थीं-“एक बार डूब ही जाए!…धनुष्कोटि की तरह पटना लापता न हो जाए कहीं….सब पाप धुल जाएगाचलो, गोलघर के मुँडे पर ताश की गड्डी लेकर बैठ जाएँबिस्कोमान बिल्डिंग की छत पर क्यों नहीं?…भई, यही माकूल मौका है। इनकम टैक्सवालों को ऐन इसी मौके पर काले कारबारियों के घर पर छापा मारना चाहिए। आसामी बामाल…” 

          राजेंद्रनगर चौराहे परमैगज़ीन कॉर्नरकी आखिरी सीढ़ियों पर पत्रपत्रिकाएँ पूर्ववत् बिछी हुई थीं। सोचा, एक सप्ताह की खुराक एक ही साथ ले लूँ। क्याक्या ले लूँ?…हेडली चेज़, या एक ही सप्ताह में फ्रेंच / जर्मन सिखा देने वाली किताबें अथवायोगसिखाने वाली कोई सचित्र किताब? मुझे इस तरह किताबों को उलटतेपलटते देखकर दुकान का नौजवान मालिक कृष्णा पता नहीं क्यों मुसकराने लगा। किताबों को छोड़ कई हिंदीबाँग्ला और अंग्रेज़ी सिने पत्रिकाएँ लेकर लौटा। मित्र से विदा होते हुए कहा-” पता नहीं, कल हम कितने पानी में रहें।बहरहाल, जो कम पानी में रहेगा। वह ज्यादा पानी में फँसे मित्र की सुधि लेगा।” 

          फ़्लैट में पहुँचा ही था किजनसंपर्ककी गाड़ी भी लाउडस्पीकर से घोषणा करती हुए राजेंद्रनगर पहुँच चुकी थी। हमारेगोलंबरके पास कोई भी आवाज़, चारों बड़े ब्लॉकों की इमारतों से टकराकर मँडराती हुई, चार बार प्रतिध्वनित होती है। सिनेमा अथवा लॉटरी की प्रचारगाड़ी यहाँ पहुँचते ही-‘भाइयोपुकारकर एक क्षण के लिए चुप हो जाती है। पुकार मँडराती हुई प्रतिध्वनित होती हैभाइयोभाइयोभाइयो…! एक अलमस्त जवान रिक्शाचालक है जो अकसर रात के सन्नाटे में सवारी पहुँचाकर लौटते समय इस गोलंबर के पास अलाप उठता है-‘सुन मेरे बंधु रेए-नसुन मोरे मितवावावा…’ 

          गोलंबर के पास जनसंपर्क की गाड़ी से ऐलान किया जाने लगा-” भाइयो! ऐसी संभावना हैकि बाढ़ का पानीरात्रि के करीब बारह बजे तकलोहानीपुरकंकड़बागऔर राजेंद्रनगर मेंघुस जाए। अतः आप लोग सावधान हो जाएँ।” 

          (प्रतिध्वनिसावधान हो जाएँ! सावधान हो जाएँ!!)

          मैंने गृहस्वामिनी से पूछा-“गैस का क्या हाल है?” 

          बस, उसी का डर है। अब खत्म होने वाला है। असल में सिलिंडर मेंमीटरउटरकी तरह कोई चीज़ नहीं होने से कुछ पता नहीं चलता। लेकिन, अंदाज़ है कि एक या दो दिनकोयला है। स्टोव है। मगर किरासन एक ही बोतल” 

          फिलहाल, बहुत हैबाढ़ का भी यही हाल है। मीटरउटर की तरह कोई चीज़ नहीं होने से पता नहीं चलता कि कब आ धमके।“-मैंने कहा। 

          सारे राजेंद्रनगर मेंसावधानसावधानध्वनि कुछ देर गूंजती रही। ब्लॉक के नीचे की दुकानों से सामान हटाए जाने लगे। मेरे फ्लैट के नीचे के दुकानदार ने, पता नहीं क्यों, इतना कागज़ इकट्ठा कर रखा था! एक अलाव लगाकर सुलगा दिया। हमारा कमरा धुएँ से भर गया। 

          सारा शहर जगा हुआ है। पच्छिम की ओर कान लगाकर सुनने की चेष्टा करता हूँहाँ पीरमुहानी या सालिमपुराअहरा अथवा जनक किशोरनवलकिशोर रोड की ओर से कुछ हलचल की आवाज़ आ रही है। लगता है, एकडेढ़ बजे रात तक पानी राजेंद्रनगर पहुँचेगा। 

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          सोने की कोशिश करता हूँ। लेकिन नींद आएगी भी? नहीं, कांपोज़ की टिकिया अभी नहीं। कुछ लिखू? किंतु क्या लिखूकविता? शीर्षकबाढ़ आकुल प्रतीक्षा? धत्

          नींद नहीं, स्मृतियाँ आने लगींएकएक कर। चलचित्र के बेतरतीब दृश्यों की तरह

          1947 मनिहारी (तब पूर्णिया, अब कटिहार ज़िला) के इलाके में गुरुजी (स्व. सतीनाथ भादुड़ी) के साथ गंगा मैया की बाढ़ से पीड़ित क्षेत्र में हम नाव पर जा रहे हैं। चारों ओर पानी ही पानी। दूर, एकद्वीपजैसा बालूचर दिखाई पड़ा। हमने कहा, वहाँ चलकर ज़रा चहलकदमी करके टाँगें सीधी कर लें। भादुड़ी जी कहते हैं ।

          किंतु, सावधान! ऐसी जगहों पर कदम रखने के पहले यह मत भूलना कि तुमसे पहले ही वहाँ हर तरह के प्राणी शरणार्थी के रूप में मौजूद मिलेंगेऔर सचमुचचींटीचींटे से लेकर साँपबिच्छू और लोमड़ीसियार तक यहाँ पनाह ले रहे थेभादुड़ी जी की हिदायत थीहर नाव परपकाही घाव‘ (पानी में पैर की उँगलियाँ सड़ जाती हैं। तलवों में भी घाव हो जाता है) की दवा, दियासलाई की डिबिया और किरासन तेल रहना चाहिए और, सचमुच हम जहाँ जाते, खानेपीने की चीज़ से पहलेपकाही घावकी दवा और दियासलाई की माँग होती ।

          1949…उस बार महानंदा की बाढ़ से घिरे बापसी थाना के एक गाँव में हम पहुँचे। हमारी नाव पर रिलीफ़ के डाक्टर साहब थे। गाँव के कई बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप में ले जाना था। एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भीकुंईकुंईकरता हुआ नाव पर चढ़ आया। डाक्टर साहब कुत्ते को देखकरभीषण भयभीतहो गए और चिल्लाने लगे-“आ रे! कुकुर नहीं, कुकुर नहीं कुकुर को भगाओ!” बीमार नौजवान छपसे पानी में उतर गया-” हमार कुकुर नहीं जाएगा तो हम हुँ नहीं जाएगा।फिर कुत्ता भी छपाक पानी में गिरा-“हमारा आदमी नहीं जाएगा तो हम हुँ नहीं जाएगा“…परमान नदी की बाढ़ में डूबे हुए एकमुसहरी” (मुसहरों की बस्ती) में हम राहत बाँटने गए। खबर मिली थी वे कई दिनों से मछली और चूहों को झुलसाकर खा रहे हैं। किसी तरह जी रहे हैं। किंतु टोले के पास जब हम पहुँचे तो ढोलक और मंजीरा की आवाज़ सुनाई पड़ी। जाकर देखा, एक ऊँची जगह मचानबनाकर स्टेज की तरह बनाया गया है।बलवाहीनाच हो रहा था। लाल साड़ी पहनकर कालाकलूटानटुआदुलहिन का हावभाव दिखला रहा था; यानी, वहधानीहै।घरनी‘ (धानी) घर छोड़कर मायके भागी जा रही है और उसका घरवाला (पुरुष) उसको मनाकर राह से लौटाने गया है। इस पद के साथ ही ढोलक पर द्रुत ताल बजने लगा-‘धागिड़गिड़धागिड़गिड़चकैके चकधुम चकैके चकधुमचकधुम चकधुम!’ कीचड़पानी में लथपथ भूखेप्यासेनरनारियों के झुंड में मुक्त खिलखिलाहट लहरें लेने लगती है। हम रिलीफ़ बाँटकर भी ऐसी हँसी उन्हें दे सकेंगे क्या! (शास्त्री जी, आप कहाँ है?) बलवाही नाच की बात उठते ही मुझे अपने परम मित्र भोला शास्त्री की याद हमेशा क्यों आ जाती है? यह एक बार, 1937 में, सिमरवनीशंकरपुर में बाढ़ के समयनावको लेकर लड़ाई हो गई थी। मैं उस समयबालचर‘ (ब्वाय स्काउट) था। गाँव के लोग नाव के अभाव में केले के पौधे काभेलाबनाकर किसी तरह काम चला रहे थे और वहीं जमींदार के लड़के नाव पर हरमोनियमतबला के साथ झिंझिर (जलविहार) करने निकले थे। गाँव के नौजवानों ने मिलकर उनकी नाव छीन ली थी। थोड़ी मारपीट भी हुई थी ।

          और 1967 में जब पुनपुन का पानी राजेंद्रनगर में घुस आया था, एक नाव पर कुछ सजेधजे युवक और युवतियों की टोली किसी फ़िल्म में देखे हुए कश्मीर का आनंद घरबैठे लेने के लिए निकली थी। नाव पर स्टोव जल रहा थाकेतली चढ़ी हुई थी, बिस्कुट के डिब्बे खुले हुए थे, एक लड़की प्याली में चम्मच डालकर एक अनोखी अदा से नेस्कैफे के पाउडर को मथ रही थी-‘एस्प्रेसोबना रही थी, शायद। दूसरी लड़की बहुत मनोयोग से कोई सचित्र और रंगीन पत्रिका पढ़ रही थी। एक युवक दोनों पाँवों को फैलाकर बाँस की लग्गी से नाव खे रहा था। दूसरा युवक पत्रिका पढ़ने वाली लड़की के सामने, अपने घुटने पर कोहनी टेककर कोई मनमोहकडायलॉगबोल रहा था। पूरेवॉल्यूममें बजते हुएट्रांजिस्टरपर गाना आ रहा था-‘हवा में उड़ता जाए, मोरा लाल दुपट्टा मलमल का, हो जी हो जी!’ हमारे ब्लॉक के पास गोलंबर में नाव पहुंची थी कि अचानक चारों ब्लॉक की छतों पर खड़े लड़कों ने एक ही साथ किलकारियों, सीटियों, फब्तियों की वर्षा कर दी और इस गोलंबर में किसी भी आवाज़ की प्रतिध्वनि मँडरामँडराकर गूंजती है। सो सब मिलाकर स्वयं ही जो ध्वनि संयोजन हुआ, उसे बड़ेसेबड़े गुणी संगीत निर्देशक बहुत कोशिश के बावजूद नहीं कर पाते। उन फूहड़ युवकों की सारी एक्ज़बिशनिज्मतुरंत छूमंतर हो गई और युवतियों के रंगे लाललाल ओंठ और गाल काले पड़ गए। नाव पर अकेला ट्रांजिस्टर था जो पूरे दम के साथ मुखर था-‘नैया तोरी मंझधार, होश्यार होश्यार‘! 

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          काहो रामसिंगार, पनियां आ रहलो है?” “ऊँहूँ, न आ रहलौ है।” 

          ढाई बज गए, मगर पानी अब तक आया नहीं, लगता है कहीं अटक गया, अथवा जहाँ तक आना था आकर रुक गया, अथवा तटबंध पर लड़ते हुए इंजीनियरों की जीत हो गई शायद, या कोई दैवी चमत्कार हो गया! नहीं तो पानी कहीं भी जाएगा तो किधर से? रास्ता तो इधर से ही हैचारों ब्लॉकों के प्रायः सभी फ़्लैटों की रोशनी जल रही है, बुझ रही है। सभी जगे हुए हैं। कुत्ते रहरहकर सामूहिक रुदन करते हैं और उन्हें रामसिंगार की मंडली डाँटकर चुप करा देती है। चौपचौप

          मुझे अचानक अपने उन मित्रों और स्वजनों की याद आई जो कल से ही पाटलिपुत्र कॉलोनी, श्रीकृष्णपुरी, बोरिंग रोड के अथाह जल में घिरे हैंजितेंद्र जी, विनीता जी, बाबू भैया, इंदिरा जी, पता नहीं कैसे हैंकिस हाल में हैं वे! शाम को एक बार पड़ोस में जाकर टेलीफ़ोन करने के लिए चोंगा उठाया बहुत देर तक कई नंबर डायल करता रहा। उधर सन्नाटा था एकदम। कोई शब्द नहीं-‘टुंग फुंगकुछ भी नहीं। 

          बिस्तर पर करवट लेते हुए फिर एक बार मन में हुआ, कुछ लिखना चाहिए। लेकिन क्या लिखना चाहिए? कुछ भी लिखना संभव नहीं और क्या ज़रूरी है कि कुछ लिखा ही जाए? नहीं। फिर स्मृतियों को जगाऊँ तो अच्छापिछले साल अगस्त में नरपतगंज थाना चकरदाहा गाँव के पास छातीभर पानी में खड़ी एक आसन्नप्रसवाहमारी ओर गाय की तरह टुकुरटुकुर देख रही थी। 

          नहीं, अब भूलीबिसरी याद नहीं। बेहतर है, आँखें मूंदकर सफ़ेद भेड़ों के झंड देखने की चेष्टा करूँउजलेउजले सफ़ेद भेड़ सफ़ेद भेड़ों के झुंड। झुंड किंतु सभी उजले भेड़ अचानक काले हो गए। बारबार आँखें खोलता हूँ, मूंदता हूँ। काले को उजला करना चाहता हूँ। भेड़ों के झुंड भूरे हो जाते हैं। उजले भेड़ उजले भेड़… काले भूरे किंतु उजले उजलेगेहुएँ रंग के भेड़…! 

          ओई द्याखोएसे गेछे जल! – झकझोरकर मुझे जगाया गया। घड़ी देखी, ठीक साढ़े पाँच बज रहे थे। सवेरा हो चुका था...आ रहलौ है! आ रहलौ है पनियां। पानी आ गेलौ। हो रामसिंगार! हो मोहन! रामचन्नरअरे हो ।

          आँखें मलता हुआ उठा। पच्छिम की ओर, थाना के सामने सड़क पर मोटी डोली की शक्ल मेंमुँह में झागफेन लिएपानी आ रहा है; ठीक वैसा ही जैसा शाम को कॉफ़ी हाउस के पास देखा था। पानी के साथसाथ चलता हुआ, किलोल करता हुआ बच्चों का एक दलउधर पच्छिमदक्षिण कोने पर दिनकर अतिथिशाला से और आगे बस्ती के पास बच्चे कूद क्यों रहे हैं? नहीं, बच्चे नहीं, पानी है। वहाँ मोड़ है, थोड़ा अवरोध है इसलिए पानी उछल रहा हैपच्छिमउत्तर की ओर, ब्लॉक नंबर एक के पास पुलिस चौकी के पिछवाड़े में पानी का पहला रेला आयाब्लॉक नंबर चार के नीचे सेठ की दुकान की बाएँ बाजू में लहरें नाचने लगीं। 

         

          अब मैं दौड़कर छत पर चला गया। चारों ओर शोरकोलाहलकलरवचीखपुकार और पानी का कलकल रव। लहरों का नर्तन। सामने फुटपाथ को पार कर अब पानी हमारे पिछवाड़े में सशक्त बहने लगा है। गोलबर के गोल पार्क के चारों ओर पानी नाच रहा हैआ गया, आ गया! पानी बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है, चढ़ रहा है, करेंट कितना तेज़ है? सोन का पानी है। नहीं, गंगा जी का है। आ गैलो… 

          सामने की दीवार की ईंटें जल्दीजल्दी डूबती जा रही हैं। बिजली के खंभे का काला हिस्सा डूब गया। ताड़ के पेड़ का तना क्रमशः डूबता जा रहा हैडूब रहा है। 

          अभी यदि मेरे पास मूवी कैमरा होता, अगर एक टेपरिकार्डर होता! बाढ़ तो बचपन से ही देखता आया हूँ, किंतु पानी का इस तरह आना कभी नहीं देखा। अच्छा हुआ जो रात में नहीं आया। नहीं तो भय के मारे न जाने मेरा क्या हाल होतादेखते ही देखते गोल पार्क डूब गया। हरियाली लोप हो गई। अब हमारे चारों ओर पानी नाच रहा थाभूरे रंग के भेड़ों के झुंड। भेड़ दौड़ रहे हैंभूरे भेड़, वह चायवाले की झोपड़ी गई, चली गई। काश, मेरे पास एक मूवी कैमरा होता, एक टेपरिकार्डर होता...तो क्या होता? अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गई। अच्छा है, कुछ भी नहीं मेरे पास। 



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