आत्मकथ्य कविता की व्याख्या | Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 Vayakhya

आत्मकथ्य कविता की व्याख्या | Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 Vayakhya

Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 Vayakhya

          आज हम आप लोगों को कृतिका भाग-2 के कक्षा-10  का पाठ-4 (Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 Vayakhya ) के आत्मकथ्य कविता की व्याख्या (Atmakatha Vayakhya ) के बारे में बताने जा रहे है जो कि जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad) द्वारा लिखित है। इसके अतिरिक्त यदि आपको और भी NCERT हिन्दी से सम्बन्धित पोस्ट चाहिए तो आप हमारे website के Top Menu में जाकर प्राप्त कर सकते हैं। 

आत्मकथ्य कविता की व्याख्या | Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 Vayakhya

पद- 1

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास

 शब्दार्थ मधुप – भौंरा , अनंत – असीम , मलिन – मैला , उपहास – मजाक ।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने अपने मन को भँवरे से तुलना किया है, जो गुनगुनाकर पता नहीं क्या कहानी कह रहा है। वह यह नहीं समझ पा रहे है कि वह अपनी जीवन की कौन सी कहानी कहे, क्योंकि उसके समीप मुरझाकर गिरते हुए पत्ते जीवन की नश्वरता का प्रतीक हैं। ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन भी एक न एक दिन इस पत्ते की तरह मुरझाकर समाप्त हो जाएगा।

कवि के अनुसार, यह नीला आकाश जो कि अनंत तक फैला हुआ है, उसमें असंख्य लोगों ने अपने जीवन का इतिहास लिखा है। जिसे पढ़कर कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो उन्होंने स्वयं की आत्मकथा लिखकर दूनिया के सामने अपना मज़ाक उड़ाया है और लोग इसे पढ़ कर उन पर हँस रहे हैं।

पद- 2

तब भी कहते हो कह-डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

शब्दार्थ दुर्बलता – कमजोरी , गागर – घड़ा , रीती – नियम ।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने अपने मित्रों से यह सवाल करने के लिए मजबुर हो जाते है कि क्या वे भी अपनी जीवन की सारी कमजोरियों को दुनिया के सामने उजागर करना चाहते है । जिन्हें पढ़कर लोग मेरी जीवन की खाली गगरी को देखकर उनका मज़ाक बनाए।

जिन मित्रों ने कवि से आत्मकथा लिखने का आग्रह किया था, उनसे कवि कहते हैं कि मेरी आत्मकथा पढ़कर और मेरे जीवन की गगरी खाली देख कर कहीं ऐसा ना हो कि वे खुद को मेरे दुखों का कारण समझ बैठे और यह सोचने लग जाए कि उन्होनें ही मेरी जीवन-रूपी गगरी को खाली किया है।

पद- 3

यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।

भूलें अपनी या प्रवंचना औरों को दिखलाऊँ मैं।

उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।

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अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

 शब्दार्थविडंबना – चिढ़ाना , प्रवंचना – ठगी ,

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से यह पता चलता है कि कवि का स्वभाव बहुत ही सरल है। इसी स्वभाव के कारण उन्हें जमाने से धोखा खाया है। परन्तु इसके बावज़ूद भी कवि को अपने स्वभाव से कोई शिकायत नहीं है और वो अपनी आत्मकथा में इसका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहते।

कवि का कहना है कि अन्होने हसीन लम्हे, जो उन्होंने अपनी प्रेमिका के साथ बिताए थे या  प्रेमिका के साथ हँसकर की गयी मीठी बातें उनके निजी अनुभव हैं और वो ये अनुभव किसी को बताना नही चाहते । ये तो उनके जीवन की पूँजी है और इस पर सिर्फ और सिर्फ उनका अधिकार है।

पद- 4

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।

अनुरागिनि उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में

शब्दार्थ स्वप्न – सपना , आलिंगन – गले लगना , अरुण – लाल रंग , उषा – भोर ,  अनुरागिनि – प्यारी ।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से यह पता चलता है जीवनभर कवि ने जिन सुखों की कल्पना की और जिनके सपने देखकर कवि कभी-कभी जाग जाते थे, उनमें से कोई भी सुख उन्हें प्राप्त नही हुई। कवि ने जब भी आपने हाथों को फैलाकर अपनी उन सुखों को गले लगाना चाहा, तब-तब उनकी प्रेमिका मुस्कुरा कर भाग गई।

कवि अपनी प्रेमिका की सुंदरता का बखान करते हुए कहते हैं कि उनकी प्रेमिका के लाल-लाल गाल इतने सुन्दर थे कि उषा भी अपनी लालिमा उन्हीं से उधार माँगती थी।

 पद- 5

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की?

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?

क्या यह अच्छा नहीं क़ि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ ?

शब्दार्थ स्मृति – याद , पाथेय – संबल , पथिक – राही , पंथा – रास्ता , कंथा – अंतर्मन ।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से यह पता चलता है कवि अपनी प्रेमिका के साथ बिताए हसीन पलों को याद कर के आज इस अकेले संसार में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है और उनके जीवन का एकमात्र सहारा उनकी प्रेमिका की यादें हैं। कवि लोगों से कहते है कि मेरी आत्मकथा पढ़कर, मेरी यादों को फिर से क्यों ताजा करना चाहते हो ? प्रस्तुत पंक्तियों में जयशंकर प्रसाद जी की महानता का पता चलता है। कवि का जीवन बहुत ही सरल और सादगी भरा है। वह स्वयं को साधारण मनुष्य मानते हैं और उनके अनुसार उन्होंने जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जिससे वो खुद के बारे में कोई आत्मकथा लिख सकें। इसलिए वो चुप रहना ही उचित समझते हैं लेकिन दूसरों की गाथाओं को वें सुनते और पढ़ते हैं।

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पद- 6

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?

अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

 

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपने मित्रों से कहते हैं कि तुम मेरी साधारण आत्मकथा सुनकर  मेरा मजाक उड़ाने के अलावा और भला क्या करोगे? मेरी आत्मकथा में तुम्हारे लायक कुछ भी नहीं मिलेगा। मैंने ऐसा कोई महानता का कार्य  नहीं किया जिसका वर्णन मैं कर सकूँ। अब मेरे जीवन के सारे दुःख शांत हो गए हैं और मुझमें अब उन्हें लिखने की इच्छा और शक्ति नहीं है।

कविता का सारांश | Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4

प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि जयशंकर प्रसाद जी ने अपने मन को भँवरे से तुलना किया है, जो गुनगुनाकर पता नहीं क्या कहानी कह रहा है। वह यह नहीं समझ पा रहे है कि वह अपनी जीवन की कौन सी कहानी कहे, क्योंकि उसके समीप मुरझाकर गिरते हुए पत्ते जीवन की नश्वरता का प्रतीक हैं। ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन भी एक न एक दिन इस पत्ते की तरह मुरझाकर समाप्त हो जाएगा।

कवि के अनुसार, यह नीला आकाश जो कि अनंत तक फैला हुआ है, उसमें असंख्य लोगों ने अपने जीवन का इतिहास लिखा है। जिसे पढ़कर कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो उन्होंने स्वयं की आत्मकथा लिखकर दूनिया के सामने अपना मज़ाक उड़ाया है और लोग इसे पढ़ कर उन पर हँस रहे हैं। कवि अपने मित्रों से यह सवाल करने के लिए मजबुर हो जाते है कि क्या वे भी अपनी जीवन की सारी कमजोरियों को दुनिया के सामने उजागर करना चाहते है । जिन्हें पढ़कर लोग मेरी जीवन की खाली गगरी को देखकर उनका मज़ाक बनाए।

जिन मित्रों ने कवि से आत्मकथा लिखने का आग्रह किया था, उनसे कवि कहते हैं कि मेरी आत्मकथा पढ़कर और मेरे जीवन की गगरी खाली देख कर कहीं ऐसा ना हो कि वे खुद को मेरे दुखों का कारण समझ बैठे और यह सोचने लग जाए कि उन्होनें ही मेरी जीवन-रूपी गगरी को खाली किया है। कवि का स्वभाव बहुत ही सरल है। इसी स्वभाव के कारण उन्हें जमाने से धोखा खाया है। परन्तु इसके बावज़ूद भी कवि को अपने स्वभाव से कोई शिकायत नहीं है और वो अपनी आत्मकथा में इसका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहते।

कवि का कहना है कि अन्होने हसीन लम्हे, जो उन्होंने अपनी प्रेमिका के साथ बिताए थे या  प्रेमिका के साथ हँसकर की गयी मीठी बातें उनके निजी अनुभव हैं और वो ये अनुभव किसी को बताना नही चाहते । ये तो उनके जीवन की पूँजी है और इस पर सिर्फ और सिर्फ उनका अधिकार है। प्रस्तुत कविता से यह पता चलता है जीवनभर कवि ने जिन सुखों की कल्पना की और जिनके सपने देखकर कवि कभी-कभी जाग जाते थे, उनमें से कोई भी सुख उन्हें प्राप्त नही हुई। कवि ने जब भी आपने हाथों को फैलाकर अपनी उन सुखों को गले लगाना चाहा, तब-तब उनकी प्रेमिका मुस्कुरा कर भाग गई।

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कवि अपनी प्रेमिका की सुंदरता का बखान करते हुए कहते हैं कि उनकी प्रेमिका के लाल-लाल गाल इतने सुन्दर थे कि उषा भी अपनी लालिमा उन्हीं से उधार माँगती थी। कवि अपनी प्रेमिका के साथ बिताए हसीन पलों को याद कर के आज इस अकेले संसार में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है और उनके जीवन का एकमात्र सहारा उनकी प्रेमिका की यादें हैं। कवि लोगों से कहते है कि मेरी आत्मकथा पढ़कर, मेरी यादों को फिर से क्यों ताजा करना चाहते हो ? कवि का जीवन बहुत ही सरल और सादगी भरा है। वह स्वयं को साधारण मनुष्य मानते हैं और उनके अनुसार उन्होंने जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जिससे वो खुद के बारे में कोई आत्मकथा लिख सकें। इसलिए वो चुप रहना ही उचित समझते हैं लेकिन दूसरों की गाथाओं को वें सुनते और पढ़ते हैं। कवि अपने मित्रों से कहते हैं कि तुम मेरी साधारण आत्मकथा सुनकर  मेरा मजाक उड़ाने के अलावा और भला क्या करोगे? मेरी आत्मकथा में तुम्हारे लायक कुछ भी नहीं मिलेगा। मैंने ऐसा कोई महानता का कार्य  नहीं किया जिसका वर्णन मैं कर सकूँ। अब मेरे जीवन के सारे दुःख शांत हो गए हैं और मुझमें अब उन्हें लिखने की इच्छा और शक्ति नहीं है।

Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 | आत्मकथ्य प्रश्न-उत्तर  

प्रश्न – अभ्यास

प्रश्न :- 1. कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है ?

उत्तर :- Read More

NCERT Solutions for Class 10 Hindi

            इस पोस्ट के माध्यम से हम कृतिका भाग-2 के कक्षा-10  का पाठ-4 (Class 10 Hindi Kshitiz Chapter 4 Vayakhya ) के आत्मकथ्य कविता की व्याख्या (Atmakatha Vayakhya ) के बारे में  जाने जो की जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad) द्वारा लिखित है। उम्मीद करती हूँ कि आपको हमारा यह पोस्ट पसंद आया होगा। पोस्ट अच्छा लगा तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूले। किसी भी तरह का प्रश्न हो तो आप हमसे कमेन्ट बॉक्स में पूछ सकतें हैं। साथ ही हमारे Blogs को Follow करे जिससे आपको हमारे हर नए पोस्ट कि Notification मिलते रहे।

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